Iran US Peace Talk 2.0- ना माना ईरान तो बहुत पछताएगा- Ambassador Deepak Vohra | Trump| Pakistan
Summary
Highlights
ईरान की कमज़ोरी और आंतरिक स्थिति00:03:07
वोहरा बताते हैं कि ट्रंप ने ईरान के सबसे बड़े गोला-बारूद डिपो पर हमला करके अपनी ताकत का प्रदर्शन किया है। वे ईरान के 'मदर ऑफ ऑल बॉम्ब्स' (MOAB) से हुए नुकसान और ईरान के लोगों पर सेंसरशिप के प्रभाव का जिक्र करते हैं। वे ईरान की सरकार को 'आतंकी सरकार' भी बताते हैं।
ईरान की आर्थिक स्थिति और क्षेत्रीय प्रभाव00:09:55
वोहरा ईरान की वित्तीय हालत पर प्रकाश डालते हुए बताते हैं कि ईरान को 270 बिलियन डॉलर का भारी नुकसान हुआ है। वे आईएसआरजी, हिज़्बुल्ला, हमास और हूतियों द्वारा विभिन्न देशों पर कब्ज़े के माध्यम से ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव पर भी चर्चा करते हैं।
भारत पर प्रभाव और विश्व युद्ध की आशंका00:13:53
भारत पर इस संघर्ष के संभावित प्रभाव पर चर्चा करते हुए वोहरा कहते हैं कि इस बात की आशंका कम है कि यह तीसरा विश्व युद्ध बनेगा क्योंकि इसमें सीमित देश शामिल हैं, न कि व्यापक वैश्विक भागीदारी।
पाकिस्तान की भूमिका और धोखेबाजी00:18:13
वोहरा पाकिस्तान की चीन और अमेरिका दोनों के साथ संदिग्ध मैत्रीपूर्ण संबंधों पर प्रकाश डालते हैं। वे पाकिस्तान के दोहरे रवैये की आलोचना करते हैं और कहते हैं कि अमेरिका पाकिस्तान पर भरोसा नहीं करता बल्कि उसका इस्तेमाल करता है।
पाकिस्तान की कूटनीति और अमेरिकी प्रभाव00:22:26
राजदूत वोहरा 'इस्लामाबाद टॉक्स' पर संदेह व्यक्त करते हैं और कहते हैं कि ईरान और अमेरिका गंभीरता से बातचीत करने को तैयार नहीं हैं। वे अमेरिका को मित्र नहीं, बल्कि 'नौकर' चाहने वाला देश बताते हैं।
आगे की संभावनाएँ00:28:46
वोहरा अनुमान लगाते हैं कि अगले 48 घंटों में सैन्य कार्रवाई हो सकती है या ईरान गोपनीय बैक-चैनल वार्ता के माध्यम से ट्रंप की शर्तों को मान सकता है। वे इस बात पर जोर देते हैं कि ईरान पर कोई भरोसा नहीं करता, यहाँ तक कि उसके अपने लोग भी।
ईरान और अमेरिका-इज़राइल के बीच तनाव00:00:02
राजदूत वोहरा ईरान, अमेरिका और इस्राइल के बीच चल रहे विवाद पर चर्चा करते हैं। वे डोनाल्ड ट्रंप की युद्ध विराम की घोषणाओं और सैन्य तैयारियों के बीच विरोधाभास को उजागर करते हैं।
सिविल सेवा दिवस और ट्रंप की रणनीति00:01:08
राजदूत वोहरा सिविल सेवा दिवस के महत्व को बताते हैं और फिर ट्रंप की उस रणनीति पर प्रकाश डालते हैं जिसमें वह बातचीत का ढोंग करते हुए अंत में सैन्य कार्रवाई करते हैं। वे हॉरमुज़ और लाल सागर से बाहर निकलकर हिंद महासागर तक फैले युद्ध के दायरे का भी जिक्र करते हैं।