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आज के इस वीडियो में सौरभ गुप्ता हेल्थ एजुकेशन ऑफिसर परीक्षा के बारे में बता रहे हैं। वे इस बात पर जोर दे रहे हैं कि इसमें अत्यधिक प्रतिस्पर्धा नहीं है और चार से पांच महीने की कड़ी मेहनत और सही सामग्री के साथ, उम्मीदवार एक गैजेटेड ऑफिसर की पोस्ट हासिल कर सकते हैं। वे अपने कोर्स की प्रभावशीलता पर भी जोर देते हैं, जिसमें स्वास्थ्य विज्ञान और यूपी जीके के लिए विशेष फोल्डर शामिल हैं।
वीडियो में नेशनल हेल्थ प्रोग्राम्स ऑफ इंडिया, विशेष रूप से लेप्रोसी (कुष्ठ रोग) के बारे में चर्चा की गई है, जिससे परीक्षा में 10 से 12 प्रश्न आने की उम्मीद है। लेप्रोसी एक संक्रामक रोग है जो त्वचा, नसों, आंखों और श्लेष्मा झिल्ली को प्रभावित करता है। यह माइकोबैक्टीरियम लेप्री नामक बैक्टीरिया के कारण होता है। इसके लक्षणों में त्वचा पर सफेद या लाल धब्बे, संवेदना का कम होना (सुन्न होना), और हाथों-पैरों में विकृति शामिल है। इस बीमारी के कारण समाज में भेदभाव भी होता था और उस समय उचित इलाज भी उपलब्ध नहीं था, जिससे यह एक गंभीर समस्या बन गई थी।
भारत सरकार ने 1955 में नेशनल लेप्रोसी कंट्रोल प्रोग्राम (एनएलसीपी) शुरू किया था। इसका मुख्य उद्देश्य लेप्रोसी के प्रसार को नियंत्रित करना था, न कि उसे पूरी तरह से खत्म करना। इसे स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा चलाया जा रहा था। इस कार्यक्रम को शुरू करने का कारण ग्रामीण क्षेत्रों में रोग का अत्यधिक फैलाव, सामाजिक भेदभाव और उचित इलाज की कमी थी। इसकी रणनीति 'सर्वे, एजुकेशन, ट्रीटमेंट' (एसईटी) थी, जिसमें गांवों में जाकर सर्वे करना, लोगों को शिक्षित करना और फिर उपचार प्रदान करना शामिल था। इस कार्यक्रम के तहत 3 लाख की आबादी पर एक लेप्रोसी कंट्रोल यूनिट (एलसीयू) स्थापित की गई थी। इस यूनिट में एक मेडिकल अधिकारी, पैरामेडिकल कर्मी, एक हेल्थ इंस्पेक्टर और फील्ड स्टाफ शामिल होते थे।
एनएलसीपी के शुरुआती उपचार में मुख्य रूप से डेप्सोन नामक दवा का उपयोग किया जाता था। डेप्सोन एक एंटी-लेप्रोसी दवा थी जो माइकोबैक्टीरियम लेप्री बैक्टीरिया की वृद्धि को रोकती थी। यह उस समय सस्ती और आसानी से उपलब्ध थी। हालांकि, कुछ समय बाद डेप्सोन थेरेपी से जुड़ी समस्याएं सामने आईं, जैसे कि कुछ मरीजों में दवा के प्रति प्रतिरोध (ड्रग रेजिस्टेंस) विकसित हो जाना और उपचार की अत्यधिक लंबी अवधि। इसके कारण एक नई रणनीति अपनाने की आवश्यकता महसूस हुई।
डेप्सोन थेरेपी की समस्याओं के चलते, 1983 में नेशनल लेप्रोसी कंट्रोल प्रोग्राम का नाम बदलकर नेशनल लेप्रोसी इरेडिकेशन प्रोग्राम (एनएलईपी) कर दिया गया। 'कंट्रोल' शब्द को 'इरेडिकेशन' से बदल दिया गया, जिससे कार्यक्रम का उद्देश्य रोग को पूरी तरह से खत्म करना हो गया। इसी समय, मल्टी-ड्रग थेरेपी (एमडीटी) नामक एक नई और अधिक प्रभावी दवा शुरू की गई। एमडीटी में तीन दवाइयां शामिल थीं: डेप्सोन, रिफैम्पीसिन और क्लोफाजिमाइन। एमडीटी को 1981 में डब्ल्यूएचओ द्वारा अनुशंसित किया गया था, और भारत में इसे 1983 में लागू किया गया।
भारत ने 2005 में लेप्रोसी उन्मूलन का लक्ष्य प्राप्त कर लिया था। डब्ल्यूएचओ के मानकों के अनुसार, 'उन्मूलन' का अर्थ है कि प्रति 10,000 आबादी पर एक से भी कम मामले हों। हालांकि, 'इरेडिकेशन' का मतलब बीमारी का दुनिया से पूरी तरह से समाप्त होना है। भारत ने इसे खत्म नहीं, बल्कि 'उन्मूलन' किया है। भारत सरकार ने 2021 से 2030 तक 'नेशनल स्ट्रेटेजिक प्लान एंड रोड मैप फॉर लेप्रोसी' लॉन्च किया है, जिसका मुख्य लक्ष्य 2030 तक भारत में लेप्रोसी के नए मामलों को पूरी तरह से समाप्त करना (ज़ीरो लेप्रोसी ट्रांसमिशन) है। इस योजना को स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा लागू किया गया है।